विश्व के सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र का प्रतीक भारत अपने बहुप्रतीक्षित आम चुनाव को संपन्न करते हुए उसके परिणाम को जानने के लिए उत्सुक है लेकिन ज़रूरी बात तो ये है कि हमें इस संपूर्ण सत्ता की कस्मकस में ये विचार करने की ज़रुरत है कि हमने क्या पाया और क्या खोया? असल में एक बात जो सबसे बेहतर रूप में उभर के आई वो है कि लोगो में पनपती जागरूकता। इसका श्रेय कही ना कही हम आम आदमी पार्टी को दे सकते है। सत्ता और पार्टी में खुलेपन की संस्कृति का श्रेय तो आखिर उनको दिया जा सकता है और इसके दूरगामी परिणाम के तहत अब सत्ता और सरकार में खुलेपन की संस्कृति का विकास हुआ है जो काम आज तक बंद कमरे में होते थे अब सरकार मजबूर है उन्हें जनता के सामने रखने को।
अब बात करते है खोने की तो ये आम चुनाव लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया की विश्वसनीयता और नियत ने काफी सवाल जग जाहिर किये है। एक विशेष पक्ष के प्रति अनर्गल विलाप एवं अघोषित चुनाव प्रचार।
एक विश्लेषण के तहत आम चुनाव में एक व्यक्ति विशेष की लहर को बताकर चुनाव लड़ा गया लेकिन भारत जैसे विशाल देश जहाँ हर प्रदेश की अपनी अलग बुनियादी ज़रुरते और अपने अलग मुद्दे है। दस साल केंद्र की यूपीए सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी जनता से संवाद स्थापित ना करना रहा और जिसका सबसे बड़ा खामियाजा उसे इस आम चुनाव में भुगतना पड़ रहा है। लोगो को लग रहा है कि हालात 77 या 89 जैसे हो गये है जब कांग्रेस के खिलाफ ज़बरदस्त आंधी चली थी और उसका सीधा लाभ विपक्ष को मिला। कोई संदेह नहीं है कि इस बार भी कांग्रेस की अलोकप्रियता चरम पर है और एनडीए और दूसरा गठबंधन सरकार बना ले। अगर इसे सत्ता परिवर्तन के रूप में देखा जाये तो ऐसा नहीं है क्यूंकि हमारी पुरानी सोच और निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी कि हम बुनियादी समानताओ को विश्लेषण का आधार बना लेते है।
बीजेपी मिशन 272 चला रही है और इस मिशन को पाना उसे दूभर लग रहा है। भारतीय राजनीति के तीसरे स्तम्भ वाम दल भी क्षेत्रीय क्षत्रपो के सामने निरंतर कमजोर पड़ रहे है। इन परिवर्तनों ने ज़रुरत से ज्यादा राजनीती के रंग ढंग को बदला है ।इस चुनाव में दवाब समूह के रूप में सिविल सोसाइटी की भी भूमिका को भी नहीं नाकारा जा सकता। आम आदमी पार्टी चुनाव में कितना असर डाल पायेगी ये देखने वाली बात होगी अगर वो एक नयी शक्ति बनकर सामने आती है तो इसके दूरगामी परिणाम अच्छे हो सकते है।
कांग्रेस की समस्या ये है कि उसके सच को कोई सच मानने को तैयार नहीं है और बीजेपी की फुसफुसाहट भी नगाडो की तरह गूंजती है। प्रधानमंत्री की दावेदारी में मोदी की उपस्थिति ने साम्प्रदायिकता के मुद्दे को पैना कर दिया है और इस मुद्दे ने समाज में एक विभाजक की रेखा खींच दी है।
इस आम चुनाव में मीडिया के काम की विश्लेषण की भी आवश्यकता महसूस होती प्रतीत हो रही है। मीडिया को चौथे स्तम्भ का दर्जा प्राप्त है लेकिन इस बार ये स्तम्भ बाकी तीन स्तंभों पर हावी होने का प्रयत्न कर रहा है और इस भूमिका ने बाकी तीन स्तंभों पर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। वास्तव में मीडिया का काम जनता के सामने सच लाने का होना चाहिए। मीडिया को चाहिए वो निष्पक्ष और निडर तरीके से कार्य करे न कि निर्णायक की भूमिका में। पत्रकार को न्यायाधीश की भूमिका में ना होकर एक समाज सुधारक और पथप्रदर्शक की भूमिका में होना चाहिए जिससे लोगो को सही गलत का अंदेशा हो और यह निर्णय जनता पर छोड़ देना चाहिये कि वह कौनसा रास्ता चुन रही है।अंत में मीडिया को बाकी तीन स्तंभों से अलग हटकर खड़े होने की आवश्यकता है और ज्यादा टीआरपी और ज्यादा खबरों की चाहत से इतर अपनी विश्लेष्णात्मकक्षमता को पहचानने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
बेहराल असल परिणाम तो 16 को ही सामने आयेगे लेकिन मेरेअनुमान के अनुसार एनडीए को सबसे बड़े दल के रूप में उभरते हुए देख रहा हूँ जिसे 180-200, यूपीए को 130-150 और शेष में तीसरे मोर्चे और अन्य दल को नंबर पाते हुए देख रहा हूँ। ममता मायावती और जयललिता की भूमिका को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता सत्ता की धुरी इन्ही के आस पास होकर ही घूमेगी। अब उम्मीद ये करनी चाहिए कि ये आम चुनाव बड़े परिवर्तन की ओर हो वो भी सकारात्मक ना कि त्राशदी और तमाशेबाजी वाला परिवर्तन बल्कि असल परिवर्तन।
अब बात करते है खोने की तो ये आम चुनाव लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया की विश्वसनीयता और नियत ने काफी सवाल जग जाहिर किये है। एक विशेष पक्ष के प्रति अनर्गल विलाप एवं अघोषित चुनाव प्रचार।
एक विश्लेषण के तहत आम चुनाव में एक व्यक्ति विशेष की लहर को बताकर चुनाव लड़ा गया लेकिन भारत जैसे विशाल देश जहाँ हर प्रदेश की अपनी अलग बुनियादी ज़रुरते और अपने अलग मुद्दे है। दस साल केंद्र की यूपीए सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी जनता से संवाद स्थापित ना करना रहा और जिसका सबसे बड़ा खामियाजा उसे इस आम चुनाव में भुगतना पड़ रहा है। लोगो को लग रहा है कि हालात 77 या 89 जैसे हो गये है जब कांग्रेस के खिलाफ ज़बरदस्त आंधी चली थी और उसका सीधा लाभ विपक्ष को मिला। कोई संदेह नहीं है कि इस बार भी कांग्रेस की अलोकप्रियता चरम पर है और एनडीए और दूसरा गठबंधन सरकार बना ले। अगर इसे सत्ता परिवर्तन के रूप में देखा जाये तो ऐसा नहीं है क्यूंकि हमारी पुरानी सोच और निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी कि हम बुनियादी समानताओ को विश्लेषण का आधार बना लेते है।
बीजेपी मिशन 272 चला रही है और इस मिशन को पाना उसे दूभर लग रहा है। भारतीय राजनीति के तीसरे स्तम्भ वाम दल भी क्षेत्रीय क्षत्रपो के सामने निरंतर कमजोर पड़ रहे है। इन परिवर्तनों ने ज़रुरत से ज्यादा राजनीती के रंग ढंग को बदला है ।इस चुनाव में दवाब समूह के रूप में सिविल सोसाइटी की भी भूमिका को भी नहीं नाकारा जा सकता। आम आदमी पार्टी चुनाव में कितना असर डाल पायेगी ये देखने वाली बात होगी अगर वो एक नयी शक्ति बनकर सामने आती है तो इसके दूरगामी परिणाम अच्छे हो सकते है।
कांग्रेस की समस्या ये है कि उसके सच को कोई सच मानने को तैयार नहीं है और बीजेपी की फुसफुसाहट भी नगाडो की तरह गूंजती है। प्रधानमंत्री की दावेदारी में मोदी की उपस्थिति ने साम्प्रदायिकता के मुद्दे को पैना कर दिया है और इस मुद्दे ने समाज में एक विभाजक की रेखा खींच दी है।
इस आम चुनाव में मीडिया के काम की विश्लेषण की भी आवश्यकता महसूस होती प्रतीत हो रही है। मीडिया को चौथे स्तम्भ का दर्जा प्राप्त है लेकिन इस बार ये स्तम्भ बाकी तीन स्तंभों पर हावी होने का प्रयत्न कर रहा है और इस भूमिका ने बाकी तीन स्तंभों पर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। वास्तव में मीडिया का काम जनता के सामने सच लाने का होना चाहिए। मीडिया को चाहिए वो निष्पक्ष और निडर तरीके से कार्य करे न कि निर्णायक की भूमिका में। पत्रकार को न्यायाधीश की भूमिका में ना होकर एक समाज सुधारक और पथप्रदर्शक की भूमिका में होना चाहिए जिससे लोगो को सही गलत का अंदेशा हो और यह निर्णय जनता पर छोड़ देना चाहिये कि वह कौनसा रास्ता चुन रही है।अंत में मीडिया को बाकी तीन स्तंभों से अलग हटकर खड़े होने की आवश्यकता है और ज्यादा टीआरपी और ज्यादा खबरों की चाहत से इतर अपनी विश्लेष्णात्मकक्षमता को पहचानने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
बेहराल असल परिणाम तो 16 को ही सामने आयेगे लेकिन मेरेअनुमान के अनुसार एनडीए को सबसे बड़े दल के रूप में उभरते हुए देख रहा हूँ जिसे 180-200, यूपीए को 130-150 और शेष में तीसरे मोर्चे और अन्य दल को नंबर पाते हुए देख रहा हूँ। ममता मायावती और जयललिता की भूमिका को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता सत्ता की धुरी इन्ही के आस पास होकर ही घूमेगी। अब उम्मीद ये करनी चाहिए कि ये आम चुनाव बड़े परिवर्तन की ओर हो वो भी सकारात्मक ना कि त्राशदी और तमाशेबाजी वाला परिवर्तन बल्कि असल परिवर्तन।