Tuesday, May 13, 2014

एक विश्लेष्ण - आम चुनाव 2014

विश्व के सबसे बड़े और मजबूत लोकतंत्र का प्रतीक भारत अपने बहुप्रतीक्षित आम चुनाव को संपन्न करते हुए उसके परिणाम को जानने के लिए उत्सुक है लेकिन ज़रूरी बात तो ये है कि हमें इस संपूर्ण सत्ता की कस्मकस में ये विचार करने की ज़रुरत है कि हमने क्या पाया और क्या खोया? असल में एक बात जो सबसे बेहतर रूप में उभर के आई वो है कि लोगो में पनपती जागरूकता। इसका श्रेय कही ना कही हम आम आदमी पार्टी को दे सकते है। सत्ता और पार्टी में खुलेपन की संस्कृति का श्रेय तो आखिर उनको दिया जा सकता है और इसके दूरगामी परिणाम के तहत अब सत्ता और सरकार में खुलेपन की संस्कृति का विकास हुआ है जो काम आज तक बंद कमरे में होते थे अब सरकार मजबूर है उन्हें जनता के सामने रखने को।
अब बात करते है खोने की तो ये आम चुनाव लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया की विश्वसनीयता और नियत ने काफी सवाल जग जाहिर किये है। एक विशेष पक्ष के प्रति अनर्गल विलाप एवं अघोषित चुनाव प्रचार।
एक विश्लेषण के तहत आम चुनाव में एक व्यक्ति विशेष की लहर को बताकर चुनाव लड़ा गया लेकिन भारत जैसे विशाल देश जहाँ हर प्रदेश की अपनी अलग बुनियादी ज़रुरते और अपने अलग मुद्दे है। दस साल केंद्र की यूपीए सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी जनता से संवाद स्थापित ना करना रहा और जिसका सबसे बड़ा खामियाजा उसे इस आम चुनाव में भुगतना पड़ रहा है। लोगो को लग रहा है कि हालात 77 या 89 जैसे हो गये है जब कांग्रेस के खिलाफ ज़बरदस्त आंधी चली थी और उसका सीधा लाभ विपक्ष को मिला। कोई संदेह नहीं है कि इस बार भी कांग्रेस की अलोकप्रियता चरम पर है और एनडीए और दूसरा गठबंधन सरकार बना ले। अगर इसे सत्ता परिवर्तन के रूप में देखा जाये तो ऐसा नहीं है क्यूंकि हमारी पुरानी सोच और निष्कर्ष निकालने की जल्दबाजी कि हम बुनियादी समानताओ को विश्लेषण का आधार बना लेते है।
बीजेपी मिशन 272 चला रही है और इस मिशन को पाना उसे दूभर लग रहा है। भारतीय राजनीति के तीसरे स्तम्भ वाम दल भी क्षेत्रीय क्षत्रपो के सामने निरंतर कमजोर पड़ रहे है। इन परिवर्तनों ने ज़रुरत से ज्यादा राजनीती के रंग ढंग को बदला है ।इस चुनाव में दवाब समूह के रूप में सिविल सोसाइटी की भी भूमिका को भी नहीं नाकारा जा सकता। आम आदमी पार्टी चुनाव में कितना असर डाल पायेगी ये देखने वाली बात होगी अगर वो एक नयी शक्ति बनकर सामने आती है तो इसके दूरगामी परिणाम अच्छे हो सकते है।
कांग्रेस की समस्या ये है कि उसके सच को कोई सच मानने को तैयार नहीं है और बीजेपी की फुसफुसाहट भी नगाडो की तरह गूंजती है। प्रधानमंत्री की दावेदारी में मोदी की उपस्थिति ने साम्प्रदायिकता के मुद्दे को पैना कर दिया है और इस मुद्दे ने समाज में एक विभाजक की रेखा खींच दी है।
इस आम चुनाव में मीडिया के काम की विश्लेषण की भी आवश्यकता महसूस होती प्रतीत हो रही है। मीडिया को चौथे स्तम्भ का दर्जा प्राप्त है लेकिन इस बार ये स्तम्भ बाकी तीन स्तंभों पर हावी होने का प्रयत्न कर रहा है और इस भूमिका ने बाकी तीन स्तंभों पर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। वास्तव में मीडिया का काम जनता के सामने सच लाने का होना चाहिए। मीडिया को चाहिए वो निष्पक्ष और निडर तरीके से कार्य करे न कि निर्णायक की भूमिका में। पत्रकार को न्यायाधीश की भूमिका में ना होकर एक समाज सुधारक और पथप्रदर्शक की भूमिका में होना चाहिए जिससे लोगो को सही गलत का अंदेशा हो और यह निर्णय जनता पर छोड़ देना चाहिये कि वह कौनसा रास्ता चुन रही है।अंत में मीडिया को बाकी तीन स्तंभों से अलग हटकर खड़े होने की आवश्यकता है और ज्यादा टीआरपी और ज्यादा खबरों की चाहत से इतर अपनी विश्लेष्णात्मकक्षमता को पहचानने की आवश्यकता महसूस हो रही है।
बेहराल असल परिणाम तो 16 को ही सामने आयेगे लेकिन मेरेअनुमान के अनुसार एनडीए को सबसे बड़े दल के रूप में उभरते हुए देख रहा हूँ जिसे 180-200, यूपीए को 130-150 और शेष में तीसरे मोर्चे और अन्य दल को नंबर पाते हुए देख रहा हूँ। ममता मायावती और जयललिता की भूमिका को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता सत्ता की धुरी इन्ही के आस पास होकर ही घूमेगी। अब उम्मीद ये करनी चाहिए कि ये आम चुनाव बड़े परिवर्तन की ओर हो वो भी सकारात्मक ना कि त्राशदी और तमाशेबाजी वाला परिवर्तन बल्कि असल परिवर्तन।

Monday, February 17, 2014

जाति आधारित जनगणना और आर्थिक आधार पर आरक्षण सामाजिक हित में या नहीं ?


जाति आधारित जनगणना  और आर्थिक आधार पर आरक्षण आज बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे है और बहुत ही चर्चा में है और कुछ लोग इसके पक्ष और विपक्ष, नुकसान और फायदे के बारे में बोल रहे है। लेकिन मेरा ये मानना है कि तस्वीर एक बार साफ़ हो ही जानी चाहिए क्यूंकि ये राजनैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी बेहद ज़रूरी है।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले अंग्रेज़ो ने जाति आधारित जनगणना  करायी थी उसके बाद काफी लम्बे समय के बाद भारत सरकार ने जाति आधारित जनगणना  कराने कि कोशिश की तो विभिन्न राजनैतिक दलो ने इसका विरोध किया और इसके विपक्ष में अनेको तर्क प्रस्तुत किये और सरकार जो जाति आधारित जनगणना  करा रही थी उसने इसका समर्थन किया और कुछ तर्क प्रस्तुत करे। जब जाति आधारित जनगणना  शुरू हुई तो लोगो ने कहा इससे जातिवाद में बढ़ोत्तरी होगी। एक तरफ हम जहाँ हम जाति को ख़त्म करने की बात कर रहे है और आधुनिकीकरण कि प्रक्रिया के तहत इनको ख़त्म कर रहे है और दूसरी तरफ ऐसी जनगणना  को शुरू करके जाति पहचान को हवा दे रहे है इससे कही ना कही आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बाधित हो रही है। जाति आधारित जनगणना  होने से विभिन्न जातियो के बीच विद्वेष बढ़ेगा इसलिए इस तरह कि जनगणना  नहीं करानी चाहिए। जिस चीज़ को हमने आज़ादी के बाद छोड़ दिया और आधुनिकीकरण कि ओर बढ़ रहे है फिर से हमे जाति आधारित पहचान को स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं बनता। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य पिछड़े लोगो कि पहचान करके उनके लिए चलाये जा रहे विभिन्न विकास के कार्यक्रमो को बढ़ावा देना था और यदि इस प्रकार कि जनगणना  होती है तो ऐसे लोगो के लिए चलाये जा रहे विकास कार्यक्रमो का सही किर्यान्वयन किया जा सकता है। इसके अलावा  अनेक तर्कों में एक तर्क यह भी था कि हमारे पास सभी जातियो कि आर्थिक सामाजिक और शैक्षिणिक स्थितियों की सूचना होगी। इन सब स्थितियों को जानने के बाद उनके लिए विकास कार्यक्रमो का संचालन सही तरीके से हुआ या नहीं और यह  पता चलेगा कि जिनके लिए हम विकास कार्यक्रम चला रहे है उनका लाभ उन तक पंहुचा कि नहीं तब तक इसका तर्कसंगत मूल्यांकन सम्भव नही है। सबसे बड़ा पक्ष ये है कि आज आरक्षण को तर्कसंगत करने कि ज़रुरत है और इस प्रक्रिया से इसे तर्कसंगत किया जा सकता है।
हमको यह भी पता है कि स्वतंत्रता के पश्चात किन परिस्थितियो और किन उद्देश्यों में आरक्षण व्यवस्था लागू कि गयी थी। इसका उद्देश्य समान अवसर पैदा करना था और सबको इसका लाभ मिल सके क्यूंकि समाज में  संरचनागत असमानता विद्यमान थी इसलिए पिछड़े लोगो को संरक्षण देकर ऊपर उठाने का प्रयास किया गया ताकि वो भी सामान अवसर का लाभ ले सके। ये प्रावधान शुरुआत में १० वर्षो के लिए किया गया था और तब ये माना गया कि इन लोगो को उठाकर जब ऊपर ले आयेगे तो फिर इसकी ज़रुरत नहीं पड़ेगी लेकिन फिर इसके साथ कही कही राजनैतिक पक्ष भी जुड़ गया और यह भारत में आज तक बना हुआ है।
इसको तर्कसंगत तो दूर करने कि बात जो जातियाँ प्रभावशाली है और दवाब समूह के रूप में अधिक मज़बूत है सरकार के ऊपर दवाब बनाकर अपनी जाति के लिए आरक्षण कि मांग कर रही है। जिनको पहले से मिल रहा है और जिनको अब ख़त्म हो जाना चाहिए था उनको भी ख़त्म करने कि सरकार में हिम्मत नहीं है और कही कही आरक्षण कुछ मुद्दो पर विकास को बाधित कर रहा है क्यूंकि हमारा विकास का लक्ष्य सामाजिक न्याय से पूर्ण विकास है। जहाँ विकास के कार्यक्रम पिछड़े लोगो तक पहुचाया जा सके और उन तक विकास का लाभ पहुचाने के लिए हमने आरक्षण का प्रावधान किया था लेकिन इस व्यवस्था ने उस लाभ को ऊपर के लोगो तक ही सीमित रखा और पिछड़ो तक इसका लाभ ना पहुचे तो इसका कोई औचित्य नहीं बचेगा और ये हमेशा क्रीमी लेयर या ऊपर के लोगो तक लाभ पहुँचाता रहेगा और हर जाति के लोगो तक इसका लाभ नहीं पहुचेगा। विकास जो हमारा लक्ष्य है ये तभी सफल होगा जब हम इसका लाभ नीचे के लोगो तक पहुचाये इसलिए हमने एस सी केटेगरी को इज़ाद किया। और  पिछड़े लोगो के लिए हमने एस टी को पृथक रखा ताकि अन्य धर्म के पिछड़े लोगो को इसमें शामिल किया जाये।  एस सी को हमने धर्म से सम्बंधित रखा।  हमे लगा और लोग बच गये है उनको भी इस व्यवस्था का लाभ मिलना चाहिए इसके लिए हमने एक और केटेगरी ओबीसी बना दी।  पंजाब सिंह देशमुख ने सर्वप्रथम इसकी मांग की और अम्बेडकर जी की आल इंडिया शिड्यूल कास्ट फेडरेशन कि तरह आल इंडिया अदर बैकवर्ड क्लास फेडरेशन की स्थापना कर दी। देशमुख जी का कहना था कि कुछ लोग बच गये है इनको सरंक्षणात्मक भेदभाव के तहत लाभ मिलना चाहिए तभी सामान अवसर का लाभ सबको मिलेगा और तभी समता मूलक समाज कि स्थापना होगी।
यहाँ तक तो सब ठीक था क्यूंकि उद्देश्य अच्छा था। आरक्षण के तहत उन्होंने लाभ लिया इससे उनका विकास भी हुआ पर धीरे धीरे इन केटेगरी में विषमता की खाई बढ़ती गयी अर्थात इन केटेगरी में जो लोग आरक्षण का लाभ ले रहे थे वो तो ऊपर निकल गए कुछ लोग इस व्यवस्था का लाभ नहीं ले पाये तब जाकर ओबीसी में क्रीमी लेयर का प्रावधान लाया गया और कहा गया जो लोग ऊपर निकल गये है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जायेगा और जो रह गये है वो इस व्यवस्था का लाभ उठाते रहेगे। लेकिन अब एस सी और एस टी में भी क्रीमी लेयर की पहचान होनी चाहिए और कही कही स्थिति आज चुकी है कि क्रीमी लेयर को खुद से बाहर आ जाना चाहिए नहीं तो दिए गये आरक्षण का लाभ सामाजिक दृष्टि से सहजातिया या कोई एक जनजातीय निरंतर लेती रहेगी और नीचे के लोगो तक इसका लाभ नहीं पहुचेगा।
अब प्रश्न उठता है सरकार करे तो कैसे करे यदि सरकार इस तरह के कोई निर्णय लेती है तो पिछड़ी जातियो का जो नेतृत्व है वो उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा क्यूंकि वो मानने को तैयार नहीं है कि आजादी के इतने दिन बाद भी उनका विकास नहीं हुआ है। दूसरी तरफ एक समस्या और आ रही है कि वे जाति समूह जो मजबूत दवाब समूह के रूप में कार्य कर रहे है वो सरकार के ऊपर अनावश्यक दवाब बनाकर आरक्षण का लाभ लेने के पक्ष में है।  इसका परिणाम राजस्थान में गुर्जरो द्वारा आंदोलन के जरिये और जाट समुदाय द्वारा बिना आंदोलन के ही आरक्षण का लाभ प्राप्त कर लेना है।यहा उद्देश्य यह है कि किसी समुदाय को आरक्षण मिले लेकिन वो तर्कसंगत हो और वो तर्कसंगत तभी हो सकता है जब हमारे पास पूरे देश के हर जाति का सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक ब्यौरा होगा, उनकी असली तस्वीर सामने होगी और ये तस्वीर जाति आधारित जनगणना  से प्राप्त होगी। इससे दो तरह का फायदा होगा।  यदि लगता है और तस्वीर बताती है कि एस सी और एस टी में एक वर्ग इतना ऊपर आ चुका है कि उन्हें आरक्षण कि ज़रुरत नहीं है तो सरकार इन तथ्यो के आधार पर उन वर्गों को क्रीमी लेयर के दायरे में ला सकती है और सरकार के पास एक आधार होगा और सरकार ऐसा करती है तो किसी राजनैतिक दल या जाति समूह सरकार का विरोध इस रूप में नहीं कर पायेगा क्यूंकि उनका नैतिक स्तर विद्यमान नहीं होगा क्यूंकि सारी तस्वीर सामने होगी और जब सरकार आकड़े सामने रखकर निर्णय लेगी तो आप अतार्किक रूप से इसकी मांग नहीं कर सकते और दूसरी बात ये होगी कि वे जातिया जो अपने को पिछड़ा बताकर आरक्षण का लाभ ले रही है यदि तस्वीर सामने आ जाये तो वो भी आरक्षण मांगने कि स्थिति में नहीं रहेगी बल्कि मागेगी ही नहीं उनको मांगना ख़राब लगेगा। यदि राजस्थान में आज जाति आधारित जनगणना  यह स्पष्ट करती है कि गुर्जर राजस्थान में सबसे विकसित समुदायो में से एक है यदि ये तस्वीर सामने आ जाती है तो क्या लगता है गुर्जर समुदाय को आरक्षण मागने की हिम्मत होगी ?
क्या अन्य जातीय समूह जो दवाब समूह के रूप में ज्यादा संगठित नहीं है जिनकी संख्या कम है जो सरकार पर दवाब बनाकर सरकार के निर्णयो को अपने समूह के हितो के पक्ष में प्रभावी करवा पाने में सक्षम नहीं है लेकिन उनकी सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति कमज़ोर है उनको  आरक्षण कि ज़रुरत है लेकिन किसी कारण उनको आरक्षण नहीं मिल पाया। जाति आधारित जनगणना  जब यह तस्वीर स्पष्ट कर देगी तो आरक्षण का लाभ उन तक भी पंहुचा पायेगे।
एक नयी चर्चा उठा रही है आर्थिक आधार पर आरक्षण।  जाति आधारित जनगणना  से हमारे सामने एक मार्ग और प्रशस्त हो जायेगा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए कि नहीं ? शुरुआत से भारत में आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन रहा है। अब प्रश्न था  कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े कौन ? अंग्रेज़ो के समय भी काफी वाद विवाद हुआ। अम्बेडकर जी लड़ते रहे क्यूंकि उसके पहले अंग्रेज़ो ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए भारतीय समाज में विभाजन उत्पन्न करने के लिए जाति आधारित आरक्षण दे चुके थे। सामाजिक और  शैक्षणिक से पिछड़े को आधार उन्होंने जाति को बनाया था इसलिए आजाद भारत को इसे स्वीकार करना पड़ा। इसको स्वीकार करने के लिए कुछ तर्क भी थे। ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज जाति प्रधान समाज रहा है  जहा निम्न जातिया सामाजिक क्षेत्रो में पिछड़ी रही तो उनके सामाजिक और शैक्षणिक आधार को पहचानने से अच्छा था कि क्यूँ ना जातियो को आधार बना दिया जाये और इस पिछड़ेपन का कारण उन्होंने जाति को बना दिया।  इस प्रक्रिया में ऊँची जाति आरक्षण का लाभ लेने से वंचित रह गयी या वे जातिया जो तथाकथित तौर पर ऊँची जातियो में गिनी जाती थी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी नहीं मानी गयी उनको इस सूची में शामिल नहीं किया गया और उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिला। उस समय के हिसाब से ये निर्णय को सही कह सकते है लेकिन आजनविन आर्थिक सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था और सरकार द्वारा किये गए प्रावधानो का लाभ उठाकर परंपरागत सामाजिक सोपान में जो नीचे के लोग है वो आज काफी ऊपर आ गए है और कई ऊपर के लोग पिछड़ भी गए है। जिससे नवीन भारतीय समाज में नए तरीके कि असमानता भी प्रकट हुई है जो नए आर्थिक विकास के मॉडल का परिणाम है और इस नए समाज कि व्यवस्था का परिणाम है।
और जब आरक्षण का उद्देश्य नीचे के लोगो को मदद करके ऊपर उठाना है जिससे वो समान अवसर का लाभ उठा सके तो जो आज पिछड़े लोग वो चाहे ऊँची जाति के हो या नीची जाति का उसे वह सुविधा मिलनी चाहिए। लेकिन सरकार ऐसा करती है तो तो कई राजनैतिक दल इसका विरोध कर सकते है जाति आधार पर भारत में विभाजन कि प्रक्रिया गतिशील हो सकती है जातिवाद बढ़ सकता है समाज विखंडन कि ओर बढ़ सकता है तो  सरकार चाह कर भी इस तरह का निर्णय नहीं ले सकती है।  बातें उठती है तो एक साथ कई विरोध के स्वर भी उठने लगते है। लेकिन जाति आधारित जनगणना  हो जाने पर हमारे सरकार के सामने एक तस्वीर बिलकुल साफ़ होगी कि  नीचे में भी कुछ ऊँची जातिया है।  जब यह तस्वीर सामने आ जायेगी तो हमारी सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण पर एक कठोर निर्णय ले सकती है और फिर किसी भी राजनैतिक दल या जाति समूह को इसका विरोध करने का नैतिक आधार नहीं मिल पायेगा।

Monday, February 10, 2014

“Oh, they’re just my type”

Think of how many people have sat next to you on a bus, train, whatever. Now think how many people have sat next to you on purpose with their fingers crossed in hope that you’ll talk to them. I’m sure somebody has. There’s plenty of times when somebody’s seen you and hoped that you spoke to them, but you never did because you don’t have the guts and neither do they. Don’t go around thinking nobody likes you and that you’re not loved. There’s been plenty of times when a stranger has spotted you and thought “Oh, they’re just my type” but haven’t had the courage or confidence to open their mouth and initiate a conversation. The funny thing is, neither have you.

Sunday, December 8, 2013

पंचायती राज समस्याएं और उपाय

आधुनिक काल में लोकतांत्रिक आदर्शों के क्रियावन्यन के लिए जिस विकेन्द्रीकरण की बात की जाती है उससे भारतीय जनमानस कभी भी अनभिज्ञ नहीं रहा है, कम से कम व्यवहारिक स्तर पर तो इसे निश्चितता पूर्वक कहा जा सकता है। हाँ,सैधांतिक स्तर पर हिन्द न तो लोकतन्त्र के बारे में और न ही विकेन्द्रीकरण के सबसे निचले पायदान पर स्थित इकाई पंचायत के बारे में भिज्ञ था।
इसके बारे में सैद्धांतिक रूप से जानकारी अंग्रेजों के शासन के बाद हुई। इन्होंने ही सर्वप्रथम भारतीयों को लोकतन्त्र के सिद्धांत का क ख ग घ पढ़ाया। ये अलग बात थी कि हमारे यहाँ कोई निर्णय लेने से पहले आम राय बनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही प्रचलित थी।ऋगवेद में उल्लेखित सभा और समिति इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यहीं समिति जिसे आम सभा कहा जाता था, राजा का चुनाव करती थीं। ये समितियां और सभाएँ इतनी शक्तिशाली हुआ करती थी कि राजा को भी इनकी सहमति के लिए इनका मुँह निहारना पड़ता था। इस तरह के प्रचलित स्वशासन पद्धति का सर्वाध्कि व्यवस्थित रूप चोल साम्राज्य में देखने को मिलता है। इनके साम्राज्य में स्थानीय स्तर पर सक्रिय अधिकारी सभी प्रकार के ऊपरी दबाव से मुक्त हुआ करता था। उसके कार्य में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप का न होना यह प्रदर्शित करता है कि स्वतन्त्रता के मूल्य की कितनी गहरी समझ देश के तत्कालीन शासकों को थी। इस पद्धति का वैधानिक अवतरण भारत में 19वीं शताब्दीं में उस सयम हुआ जब अंग्रेजी हूकूमत राजस्व प्राप्त करने के नये तरीके ढूढ़ रही थी। इस छानबीन की पद्धति में उसे स्थानीय शासन की स्थापना का ख्याल आया और आधुनिक भारत के इतिहास में वैधनिक रूप से 1882 में रिपन ने स्थानीय शासन पद्धति की स्थापना की। हॉलाकि यह शुरूआत भारत में इस प्रकार की पद्धति को सुदृढ़ करने के लिए नहीं की गयी थी, बल्कि इसके जरिए राजस्व के सृजन के नये स्रोत स्थापित करना था। इसी प्राथमिक ध्येय की वजह से इस दिशा में कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई। हाँ, स्वतन्त्राता के उपरान्त गाँधीवादी विचार को अंगीकृत करते हुए संविधन के भाग 4 राज्य के नीति  निदेशक तत्व में इसे शामिल किया। बावजूद इसके पंचायत राज संस्थाओं की स्थापना में सही प्रगति 1990 के दशक में हुए। हाँलाकि इसके पहले गांध्ी के प्रिय शिष्य और भारत के प्रथम प्रध्नमंत्राी जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले से इसकी शुरूआत कर दी थी। मगर वह 1990 के दशक में हुई शुरूआत की तरह जनसंख्या के अनुसार आरक्षण देने का प्रावधन किया गया। कुछ इसी तरह की छूट अन्य पिछड़ा वर्ग के संदर्भ में राज्यों को दी गयी है। हाँ, महिलाओं के लिए 1/3 सीटें आरक्षित की गयी थी जिन्हें बढ़ाकर अब 50% कर दिया है। इन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए 29 विषय आवंटित किये गये हैं। सरकार द्वारा उठाये गये इस कदम में संघीय शासन व्यवस्था की परिभाषा को ही बदल दिया। सामान्यतः संघ वह होता है जिसमें केन्द्र और राज्य स्तर पर दो सरकारें बिना एक-दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप किये हुए अपना-अपना कार्य संचालित करती है। इस परिभाषा में संशोध्न भारत के 73वें संविधन संशोधन ने कर दिया। अब के भारत की दृष्टि में संघ उसे कहेंगे जहाँ पर द्वस्तीय सरकार के बजाय त्रिस्तरीय सरकार हो। सरकार के इस प्रयोग ने निश्चित रूप से शासन का विकेन्द्रीकरण किया है और आम लोगों को अपने नीति निर्धरण में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का मौका दिया है। इसने हाशिए पर खड़े उन लोगों को नीति निर्धरण करने का मौका दिया जिन्हें समाज इसके लिए असक्षम मानता था। इसके बाद भी इस स्थानीय शासन प्रणाली से जो आशा की गयी थी उसे पूरा करने में यह पूर्ण रूप से सपफल नहीं रही है। इस आंशिक सपफलता की वजह इसमें वर्तमान कई समस्याएं रही है। पहला, ग्राम सभा की सबसे बड़ी समस्या है कि इसकी नियमित बैठकें नहीं होती हैं। ग्राम सभा काम तो तभी करेगी जब इसकी नियमित रूप से बैठकें हों। यदि ग्राम सभा की बैठक होती है तो ग्रामीण जनों की भागीदारी बहुत कम होती है। ग्राम सभा की बैठक की सूचना भी सभी गांववासियों तक नहीं पहुँचती जोकि शोचनीय है। ग्राम पंचायतों में गुटबाजी की वजह से पदासीन सरपंच या उसके पक्ष के लोग ही ग्राम सभा में आते हं। ग्राम सभाओं में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी बहुत ही कम है। स्थिति यह है कि ग्राम सभा की बैठकों में कोरम तक पूरा नहीं हो पाता है। दूसरा, पंचायती राज व्यवस्था में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, निष्क्रियता आदि कारणों से सरपंच या पंचायत सदस्य ग्राम सभा की बैठक नहीं बुलाते हैं जिसमें ग्रामीणों को पूरी तरह से अनभिज्ञ रखा जा सके। तीसरी ग्राम सभा की बैठकों में ग्रामीणों में दिलचस्पी का भी अभाव है। महिलाओं की कम सहभागिता, पुरुषों की खेत-खलिहानों में व्यस्तता, ग्रामीण विकास के प्रति जागरुकता की कमी इत्यादि कारणों से भी ग्राम सभा में उपस्थिति बहुत कम रहती है। चौथा, ग्राम सभा के काम-काज के बारे में गांवों के लोगों को जानकारी नहीं है। ग्राम सभा के क्या कार्य व अध्किार हैं, ग्राम पंचायत ग्राम सभा के साथ मिलकर कैसे कार्य करेगी, ग्राम सभा की बैठक में किस तरह के प्रस्ताव रखे जाएं, ग्राम सभा के सदस्य में रूप में हमारे क्या अधिकार हैं आदि की जानकारी का ग्राम सभा के सदस्यों में अभाव है। पांचवा, ग्राम सभा का क्षेत्रा बहुत-सी ग्राम पंचायतों में बहुत बड़ा होता है। कई ग्राम पंचायतों में छोटे-छोटे गांव, ढाणी शामिल हैं जोकि 5-6 किमी की दूरी पर भी स्थित हैं। इतनी दूरी तय कर लोग ग्राम सभा की बैठकों में नहीं जा पाते विशेषकर स्त्रियाँ व दिहाड़ी मजदूर वर्ग के लोगों के सामने यह बड़ी समस्या है। बड़ी पंचायतों व गांवों में ज्यादा दूरी ने भी निर्णय प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने में बाधा खड़ी की है। छठवा, ग्राम सभा की इच्छा व परामर्श से ग्राम पंचायतों को कार्य करना है न कि पंचायतों को अपनी मन मर्जी से कार्य करना है। ग्राम सभा द्वारा स्वीकृति मिलने पर ही पंचायती राज संस्थाओं को योजनाओं व कार्यक्रमों को लागू करना चाहिए। लेकिन पंचायती राज संस्थाएं ग्राम सभा को नशरअंदाज करके ही कार्य करती है। इस तरह ग्राम सभा का पंचायतों के कामकाज पर कारगर नियंत्राण नहीं है। सातवा, आज पंचायती राज व्यवस्था का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है। पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य सभी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए हैं। पंचायत चुनावों में ध्न, बल, बाहुबल का प्रयोग होता है। ग्राम सभा में भी स्थानीय राजनीति व गुटबाजी का प्रभाव दिखता है जिससे इसमें उपस्थिति धीरे- धीरे कम होती जा रही है इससे स्थिति और बिगड़ गई है। आठवा, ग्राम सभा केवल चर्चा करने का मंच बनकर रह गई है। ग्राम सभाओं में जानबूझकर ग्राम पंचायत द्वारा भ्रमित करने वाली चर्चाएं कराई जाती हैं। ग्रामीणों का ध्यान जान-बूझकर बेवजह की चर्चाओं, वाद-विवाद से भटकाया जाता है। ग्राम सभाओं कीचर्चाओं में संभ्रांत लोगों की ज्यादा भूमिका होती है। इस तरह से ग्राम सभा की बैठकों को जान-बूझकर निष्प्रभावी बनाया जाता है। नौवा, विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी और उपलब्ध् साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि यदि महिला सरपंच है या अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य सरपंच है तो उसकी अध्यक्षता में ग्राम सभा की बैठक में हिस्सा लेना बहुत से लोग अपनी शान के खिलापफ समझते हैं। इत तरह की विकृतियों ने भी ग्राम सभा की बैठकों में कम उपस्थिति को बढ़ावा दिया जाता है। इन कारणों की वजह से समाज के विभिन्न वर्गों को पंचायती राज व्यवस्था में मिलने वाले प्रतिनिध्त्वि को चुनौती दी है। दसवा,ं कुछ ग्राम सभा की बैठकें मात्रा रस्मी रह गई हैं। ग्राम पंचायत से जुड़े लोग रजिस्टर घर-घर घुमा कर लोगों के हस्ताक्षर ले लेते हैं और सभा में गए बिना ही उनकी उपस्थिति बन जाती है। पंचायतें कागशी तौर पर काम करने लगी हैं। इस तरह की घटनाओं ने पंचायती राज व्यवस्था से लोगों का विश्वास तोड़ा है। ग्यारहवा ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था का अभिन्न अंग है। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद द्वारा विकास कार्यों में निभाई गई भूमिका का पूरी पंचायती राज व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। जिस तरह से संभ्रांत लोगों का इस व्यवस्था में दबदबा है उससे पूरी पंचायती राज व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। बारहवा ग्राम सभा की कार्यवाही पर नौकरशाही व राज्य प्रशासन को विश्वास नहीं है। ग्राम सचिव और अन्य ग्रामीण विकास अधिकारी अभी भी ग्राम सभा की कार्यवाही और प्रस्तावों में किसी भी तरह का विश्वास नहीं करते हैं। यह धरणा है कि ग्राम सभा के प्रस्ताव उचित नहीं हो सकते और ग्रामीणों की सोच-समझ ग्रामीण विकास के प्रति विश्वसनीय नहीं हो सकती है। यह निर्णय प्रक्रिया में उचित सहभागिता नहीं निभा सकते है। तेरहवा कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि पंचायती राज संस्थाओं के लोग ग्राम सभा के सशक्तीकरण की बातें तो शरूर करते हैं लेकिन वे ये नहीं चाहते हैं कि ग्रामीण जन जागरूक हों सत्तासीन लोगों को भय है कि ग्राम सभी की सक्रियता से उनका महत्व घट जाएगा। ग्राम सभा को एक समस्या के रूप में भी लोग देखते हैं। इस तरह पंचायती राज व्यवस्था के लोग भी ग्राम सभा को सुमुप्त और कमजोर रखना चाहते हैं। चौदहवा, पंचायती राज के विशेषज्ञ प्रोपेफसर एम. असलम के अनुसार, राज्यों के पंचायत कानूनों में ग्राम सभा की भूमिका और जिम्मेदारियो का अगर  ज्यादातर मामलों में ग्राम सभा की भूमिका सलाह देने वाली संस्था की ही है। इसी तरह, ज्यादातर राज्यों के कानूनों में कहा गया है कि ग्राम सभा सलाह देने वाली संस्था है और पैफसले लेने के अधिकार ग्राम पंचायत के पास हैं। इस तरह राज्यों के कानून में सबसे बड़ी कमी पंचायतों और ग्राम सभाओं केअधिकारों और कार्यक्षेत्रा के निर्धरण के मामलों में है अन्ततः यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्राम सभा के सशक्तीकरण में सरकारी प्रयास सराहनीय नहीं रहे हैं। पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों को समय-सयम पर प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन ग्राम सभा सदस्यों को किसी भी तरह का प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया जाता है जिससे ग्राम सभा के कार्य, उत्तरदायित्व व निर्णय प्रक्रिया से ग्राम सभा के सदस्य हमेशा अनभिज्ञ रहते हैं। अब यदि इनके उचित निष्पादन को व्यवहारिक ध्रातल पर साकार करने की प्रतिबद्धता रखते है तो कई ऐसे काम उठाने होंगे जिनसे इन्हें और सशक्त बनाया जा सके। इसके लिए सबसे पहले ग्राम सभा के कार्य, अधिकार व उत्तरदायित्वों की ग्रामीणों को पुख़्ता जानकारी व शिक्षा दी जाए। इसके लिए जन-जागृति कार्यक्रम चलाना चाहिए। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रा में ग्राम सभा संबंद्धि जनसभा, संगोष्ठी, प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक, आकाशवाणी कार्यक्रम, दूरदर्शन कार्यक्रम इत्यादि आयोजित करने चाहिए। दूसरा प्रौढ़ शिक्षा केंद्रों व कार्यक्रमों में ग्राम सभा के कार्य वअधिकारों की जानकारी दी जानी चाहिए। ग्राम सभा के सदस्यों को छोटे-छोटे प्रशिक्षण मॉड्यूल पर आधरित शिक्षा दी जा सकती है। तीसरा पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों जैसे- सरपंच, पंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्यों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों व पंचायती राज पदाधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विशेषकर ग्राम सभा के महत्व व इसकी सक्रियता पर विशेष रूप से प्रशिक्षण देना चाहिए। ग्राम पंचायत के सदस्यों को विशेषकर ग्राम सभा का महत्व बताना चाहिए ताकि ग्राम सभा नियमित रूप से ग्रामीण विकास में अपना योगदान कर सके। चौथा ग्राम सभा की यदि नियमित रूप से आवश्यक व निश्चित बैठक नहीं होगी तो इसका अर्थ ही समाप्त हो जाएगा। यदि कोई सरपंच या अन्य सदस्य किसी भी कारण से ग्राम सभा की बैठक नहीं करवाता है तो संबंध्ति सरकारी अपफसरों व ग्राम पंचायतों पर सख़्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि कानूनी डर से लोग इसकी नियमित बैठक कराएं। इस तरह ग्राम सभा की भूमिका तथा दायित्व और ग्राम पंचायत के कार्यों के साथ उसके संबंध् का भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए जिससे हर स्तर पर स्पष्टता निश्चित हो। पाँचवां ग्राम पंचायतों का स्वरूप व क्षेत्रा भी बड़ा नहीं होना चाहिए। 7-8 गांव या ढाणियों को एक ग्राम सभा नहीं होनी चाहिए। गांवों की दूरियों  के कारण दिहाड़ी मशदूर, बुजुर्ग तथा महिलाओं के लिए बैठकों में हिस्सा लेना कठिन होता है। इसलिए हर गांव की अपनी ग्राम सभा होनी चाहिए। छठवां महिला व दलित वर्ग के प्रतिनिधियों के नेतृत्व में भी ग्राम सभा की बैठकों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि इस वर्ग के नेतृत्व को वास्तव में ग्रामीण समाज स्वीकार कर सके। इस तरह के प्रयासों से भी ग्राम सभा में उपस्थिति व इसकी प्रक्रिया में सक्रियता बढ़ेगी। सातवां गा्रम सभा के सशक्तीकरण में ग्राम सचिव, पंचायत पदाधिकारियों व नौकरशाही की भूमिका महत्वपूर्ण है। नौकरशाही व राज्य प्रशासन को ग्राम सभा में विश्वास व्यक्त करना चाहिए। ग्रामीणों की निर्णय प्रक्रिया व विकास की प्राथमिकताओं का नौकरशाही द्वारा सम्मान किया जाना शरूरी है। आठवां ग्राम सभा को केवल सलाह-मशविरा वाली संस्था नहीं समझना चाहिए। गांव के स्तर पर सभी विकास योजनाओं व आगामी वित्तीय वर्ष के बजट की मंजूरी देने का अधिकार ग्राम सभा के पास कागजी तौर पर न होकर वास्तव में होना चाहिए। ग्राम सभा की बैठकों की कार्यवाहियों का रिकार्ड रखना चाहिए। समय-समय पर उसकी जांच ग्राम पंचायत के कार्यों के साथ करनी चाहिए। ग्राम सभा के निर्णय वास्तविक रूप से गा्रम पंचायत द्वारा मान्य होने चाहिए। राज्य सरकारें अपने कानूनों द्वारा ग्राम सभा को अधिकार देकर इसको सशक्त बनाए जिससे इसकी उपयोगिता सार्थक हो सके। आठवां ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद के कार्य व अधिकारों के बारे में भी ग्रामीणों को जानकारी होना शरूरी है। इससे पंचायती राज संस्थाएं क्या कर सकतीं हैं इसका पता चल सके। का पता चल सके। इससे ग्राम सभा में सामाजिक अंकेक्षण भी स्पष्ट तौर पर होगा। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की विभिन्न माध्यमों द्वारा ग्राम सभा सदस्यों को जानकारी देनी चाहिए। ग्रामीण अंचलों में केंद्रीय व राज्य सरकारों के कौन से कार्यक्रम चल रहे हैं इन सभी का प्रचार व प्रसार ग्राम सभा सदस्यों तक पहुँचना चाहिए जिससे वे ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें। नौवा ग्राम सभा की सक्रियता व सपफलता पूरी तरह से ग्राम पंचायत पर निर्भर करती है। इसलिए पंचायत राज पदाधिकारियों द्वारा ग्राम पंचायत को वैधनिक तौर पर ग्राम सभा की विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल करने का प्रयास करते रहना चाहिए। ग्रामीण विकास की चालू योजनाओं व आगामी योजनाओं सम्बन्धी विभिन्न प्रकार के निर्णय ग्राम सभा द्वारा आवश्यक तौर पर किए जाने चाहिए जिसका ग्राम सचिव लिखित रूप में रिकार्ड रखे। दसवाँ ग्राम सभा को व्यापक दृष्टिकोण से देखने का शरूरत है। ग्रामीण जीवन की समस्याओं को भी ग्राम सभा के विचार क्षेत्रा में लाया जाना चाहिए जिससे समस्याओं के समाधन में गांव के लोग सहयोग कर सकें। नशबंदी, दहेज प्रथा, सपफाई, स्वास्थ्य, अकाल, भूकंप, शिक्षा, अनुसूचित जाति व जनजाति और पिछड़े वर्गों के विकास और कल्याण संबंध्ी विषयों पर भी ग्राम सभा में विचार-विमर्श किया जा सकता है।

अंत में हम कह सकते हैं कि ग्राम सभाओं की सक्रियता से ग्राम पंचायत ग्रामीण विकास का कार्य ईमानदारी और निष्ठा से कर सकती है। ग्राम सभा ही ग्राम पंचायतों पर नियंत्राण कर सकती हैं। ग्रामवासियों को ग्राम सभा का महत्व, कार्य औरअधिकारों को समझना होगा क्योंकि यही एक ऐसा मंच है जहां पर सामाजिक अंकेक्षण हो सकता है। इसलिए ग्राम सभा का जीवंत रूप में कार्य करना अनिवार्य हो जाता है। ग्राम सभा केवल खानापूर्मि की ही जगह न बन जाए बल्कि यह लोगों को ग्रामीण विकास के प्रति जागरूक करे। ग्राम सभाओं को कारगर बनाकर ही ग्राम स्वराज का सपना साकार हो सकता 
है।

Thursday, October 24, 2013

There is no Wi-Fi in the forest, but you'll find a better connection!

Wednesday, October 23, 2013

इतनी मगझमारी क्यों ?


अजीब सा शोर जो आज के पहले कभी नही देखा। अजीब सी कशमकस शायद एक दूसरे से आगे निकलने की होड़।
कहावत है "ये तूफ़ान के  आने से पहले की ख़ामोशी है " लेकिन यह आज कल सब उल्टा पुल्टा हो रहा है यहाँ तूफ़ान के आने से पहले ही इतना शोर है कि क्या बताये।  शायद हम पीछे ना रह जाये उसे सब ना मिल जाये दौड़ो रे बाबा दौड़ो क्या छोटा क्या बड़ा सब भागे जा रहे है।
सवाल उठता है इतनी मगझमारी क्यूँ ?
आप शायद  अभी तक समझे नहीं आगे पढ़िए सब समझ आ जायेगा।

अपनी  लाइन लम्बी दिखाने के लिए दूसरी की लाइन को छोटा किया जा रहा है। कोशिश अपनी लाइन को लम्बा ना करने की होकर दूसरे की लाइन मिटाने में लगे है।
पत्रकारिता का इतना गन्दा और बेहूदा स्तर देखकर तो बस एक ही चीज़ याद आती है क्यूँ ना सास बहू के सीरियल में इंटरेस्ट जगाया जाये पर कमबख्त ये भी नही होता।

अब्दुल कलाम जी के अनुसार 
यहाँ का मीडिया इतना निगेटिव क्यूँ है ? हम भारतीय अपनी स्वयं की शक्ति पहचानने से क्यूँ घबराते है ?

हम सब एक महान राष्ट्र है। हमारी सफलता की कहानिया आश्चर्यचकित करने वाली होती है। लेकिन हम उन्हें ख़ारिज कर देते है। क्यूँ ?
हम दुग्ध उत्पादन में सबसे अव्वल है। हम दूर संवेदी उपग्रहों में सबसे अव्वल है। गेंहू उत्पादन मामले में हम दुसरे नंबर में आते है। हम सबसे बड़े चावल उत्पादक भी है।
डॉक्टर सुदर्शन को देखिये उन्होंने एक आदवासी गाँव को स्वपोषित और आत्मनिर्भर बना दिया। इस तरह लाखो उपलब्धिया है लेकिन हमारा मीडिया बुरी खबरों , विफलताओ और आपदाओ के पीछे पड़ा रहता है।

एक बार मैं (डॉक्टर कलाम) तेल अबीब में था और एक इजराइली अखबार पढ़ रहा था। पिछले दिनों इजराइल पर बहुत हमले हुए थे बम बरसाए गये थे और अनेको मौते हुई थी। हमले हमास ने किये थे। लेकिन अख़बार के मुख्य प्रष्ठ पर एक यहूदी भद्र पुरुष की तस्वीर छापी थी। जिन्होंने पांच सालो में अपनी उसर भूमि को आर्किड और उपजाऊ भूमि में बदल दिया। सुबह उठकर लोगो ने सबसे पहले प्रेरक तस्वीर देखी। हत्या बमबारी और मौत की भयानक खबरे अन्दर के पेजों में छपी थी।
भारत में केवल हम मौत बीमारी आतंकवाद और अपराध की खबरे पढ़ते है आखिर हम इतना नेगेटिव क्यूँ है ?


   

कौन कहता है पुराना वक़्त लौट कर नहीं आता

ये लाइन जो मैंने लिखी है ये लाइन आजादी के पहले नेहरु जी ने अपनी पुस्तक भारत की खोज में लिखी थी |

और बिडम्बना देखिये तब की कही बाते आज लफ्ज़ व लफ्ज़ आज कैसे सटीक बैठ रही है। 



आज की दुनिया ने बहुत कुछ हासिल किया है लेकिन मानवता के प्रति प्रेम की घोषणा के होते हुए भी उनकी बुनियाद उन खूबियों की जगह, जो आदमी को इंसान बनाती है, नफरत और हिंसा से ज्यादा रही है। 
भी कभी ऐसा हो सकता है की लड़ाई का टालना मुमकिन ना हो,लेकिन उसके नतीजे बहुत खतरनाक होते है। उसमे सिर्फ आदमियों की जान ही नहीं ली जाती बल्कि जान बूझकर लगातार झूठ और नफरत का प्रचार किया जाता है और धीरे धीरे ये बातें लोगो की आम आदत हो जाती है।
अपनी जिन्दगी के बहाव के बहाव में नफरत और झूठ के इशारो पर चलना बहुत खतरनाक होता है। उससे ताकत की बर्बादी होती है दिमाग संकरा और विकृत हो जाता है और सच्चाई को देखने में रूकावट होती है।
दुःख की बात ये है की आज हिंदुस्तान में बहुत सख्त नफरत है। गुजरा जमाना हमारा पीछा करता है और मौजूदा जमाना उससे अलग नहीं है।
धर्म और जातियों की शान पर जो बार बार चोट की गयी है और की जा रही है उसको भूलना आशान नहीं है। लेकिन खुशकिस्मती से हिन्दुस्तानियों में नफरत की आदत नहीं है और जल्दी ही उनकी सद्व्रतिया ऊपर आ जाती है।

भारत की खोज का एक अंश