Thursday, October 24, 2013

There is no Wi-Fi in the forest, but you'll find a better connection!

Wednesday, October 23, 2013

इतनी मगझमारी क्यों ?


अजीब सा शोर जो आज के पहले कभी नही देखा। अजीब सी कशमकस शायद एक दूसरे से आगे निकलने की होड़।
कहावत है "ये तूफ़ान के  आने से पहले की ख़ामोशी है " लेकिन यह आज कल सब उल्टा पुल्टा हो रहा है यहाँ तूफ़ान के आने से पहले ही इतना शोर है कि क्या बताये।  शायद हम पीछे ना रह जाये उसे सब ना मिल जाये दौड़ो रे बाबा दौड़ो क्या छोटा क्या बड़ा सब भागे जा रहे है।
सवाल उठता है इतनी मगझमारी क्यूँ ?
आप शायद  अभी तक समझे नहीं आगे पढ़िए सब समझ आ जायेगा।

अपनी  लाइन लम्बी दिखाने के लिए दूसरी की लाइन को छोटा किया जा रहा है। कोशिश अपनी लाइन को लम्बा ना करने की होकर दूसरे की लाइन मिटाने में लगे है।
पत्रकारिता का इतना गन्दा और बेहूदा स्तर देखकर तो बस एक ही चीज़ याद आती है क्यूँ ना सास बहू के सीरियल में इंटरेस्ट जगाया जाये पर कमबख्त ये भी नही होता।

अब्दुल कलाम जी के अनुसार 
यहाँ का मीडिया इतना निगेटिव क्यूँ है ? हम भारतीय अपनी स्वयं की शक्ति पहचानने से क्यूँ घबराते है ?

हम सब एक महान राष्ट्र है। हमारी सफलता की कहानिया आश्चर्यचकित करने वाली होती है। लेकिन हम उन्हें ख़ारिज कर देते है। क्यूँ ?
हम दुग्ध उत्पादन में सबसे अव्वल है। हम दूर संवेदी उपग्रहों में सबसे अव्वल है। गेंहू उत्पादन मामले में हम दुसरे नंबर में आते है। हम सबसे बड़े चावल उत्पादक भी है।
डॉक्टर सुदर्शन को देखिये उन्होंने एक आदवासी गाँव को स्वपोषित और आत्मनिर्भर बना दिया। इस तरह लाखो उपलब्धिया है लेकिन हमारा मीडिया बुरी खबरों , विफलताओ और आपदाओ के पीछे पड़ा रहता है।

एक बार मैं (डॉक्टर कलाम) तेल अबीब में था और एक इजराइली अखबार पढ़ रहा था। पिछले दिनों इजराइल पर बहुत हमले हुए थे बम बरसाए गये थे और अनेको मौते हुई थी। हमले हमास ने किये थे। लेकिन अख़बार के मुख्य प्रष्ठ पर एक यहूदी भद्र पुरुष की तस्वीर छापी थी। जिन्होंने पांच सालो में अपनी उसर भूमि को आर्किड और उपजाऊ भूमि में बदल दिया। सुबह उठकर लोगो ने सबसे पहले प्रेरक तस्वीर देखी। हत्या बमबारी और मौत की भयानक खबरे अन्दर के पेजों में छपी थी।
भारत में केवल हम मौत बीमारी आतंकवाद और अपराध की खबरे पढ़ते है आखिर हम इतना नेगेटिव क्यूँ है ?


   

कौन कहता है पुराना वक़्त लौट कर नहीं आता

ये लाइन जो मैंने लिखी है ये लाइन आजादी के पहले नेहरु जी ने अपनी पुस्तक भारत की खोज में लिखी थी |

और बिडम्बना देखिये तब की कही बाते आज लफ्ज़ व लफ्ज़ आज कैसे सटीक बैठ रही है। 



आज की दुनिया ने बहुत कुछ हासिल किया है लेकिन मानवता के प्रति प्रेम की घोषणा के होते हुए भी उनकी बुनियाद उन खूबियों की जगह, जो आदमी को इंसान बनाती है, नफरत और हिंसा से ज्यादा रही है। 
भी कभी ऐसा हो सकता है की लड़ाई का टालना मुमकिन ना हो,लेकिन उसके नतीजे बहुत खतरनाक होते है। उसमे सिर्फ आदमियों की जान ही नहीं ली जाती बल्कि जान बूझकर लगातार झूठ और नफरत का प्रचार किया जाता है और धीरे धीरे ये बातें लोगो की आम आदत हो जाती है।
अपनी जिन्दगी के बहाव के बहाव में नफरत और झूठ के इशारो पर चलना बहुत खतरनाक होता है। उससे ताकत की बर्बादी होती है दिमाग संकरा और विकृत हो जाता है और सच्चाई को देखने में रूकावट होती है।
दुःख की बात ये है की आज हिंदुस्तान में बहुत सख्त नफरत है। गुजरा जमाना हमारा पीछा करता है और मौजूदा जमाना उससे अलग नहीं है।
धर्म और जातियों की शान पर जो बार बार चोट की गयी है और की जा रही है उसको भूलना आशान नहीं है। लेकिन खुशकिस्मती से हिन्दुस्तानियों में नफरत की आदत नहीं है और जल्दी ही उनकी सद्व्रतिया ऊपर आ जाती है।

भारत की खोज का एक अंश

सचिन के नाम पाती

आदरणीय सचिन

जब पता चला आप अपना २००वां टेस्ट मैच खेलकर सन्यास ले लेगे तो अफ़सोस बस सिर्फ इस बात का रहा कि आपको कभी मैदान में खेलते हुए लाइव नहीं देख पाया।
२४ सालो तक लगातार लोगो की भावनाओ को अनवरत अपने कंधो पर ढोना किसी दैवीय चमत्कार से तो कम नहीं है। दरअसल आज भारत में ही नही वरन पूरे संसार में आपके क्रिकेट की स्वर्णिम यात्रा की विदाई का दुःख भी है। ट्विटर पर ऐसे देश की ट्रेंड लिस्ट में आपकी विदाई के चर्चे थे जहा क्रिकेट को जिया नहीं जाता।
हमेशा आपको खेलते हुए देखा और सबके मुह से सिर्फ एक ही बात सुनी सचिन है ना। वो नाम जो शायद तीन पीढियों में एक साथ जोश जगा दे।
मैने तो नहीं देखा लेकिन सुना जरूर है वकार युनुस की पहली गेंद लगने के बाद उठकर "मैं खेलूगा " की जिद्द हो या अब्दुल कादिर जेसे दिग्गज की धज्जिया उड़ाना हो। कोर्टनी एम्ब्रोस , इयान बाथम और शोएब अख्तर की धज्जिया उड़ाना हो या कम उम्र में पर्थ की पिच पर सेंचुरी जमाना हो या कैडिक की बॉल पर छक्का मारना रहा हो शुरूआत से आप दबदबे का नाम रहे हो। लाइट चले जाने पर रेडियो पर कमेन्ट्री सुनना रहा हो या हॉस्टल में आपके वन डे में पहले २०० रन बनाने पर हॉस्टल के बास्केट बॉल ग्राउंड पर दोस्तों के साथ नाचना हो। मोहल्ले में चन्दा इकठ्ठा करके जेनरेटर सेट लाकर आपकी बेटिंग देखना हो कभी कोई भूल नहीं सकता। आगे आने वाली पीढ़ी के लिए आप सिर्फ नाम होगे लेकिन हमने आपको जिया है। बहुत से दोस्त जो क्रिकेट का ए बी सी डी नहीं जानते वो सिर्फ आपको ही देखना पसंद करते थे। शायद आपका २००वं टेस्ट उनका भी अंतिम मैच हो।
जनता ने आपको हमेशा भगवान का दर्जा दिया लेकिन आपने अपने आपको हमेशा इंसान समझा आपके देश प्रेम चाहे वो मराठी मानुष वाला बयान हो या फिर मुंबई अटैक के बाद आपका देश के लिए सन्देश आपको हमेशा लोगो ने अपने से जुड़ा हुआ देखा।
हम सब की जिन्दगी को सचिन ने किसी न किसी दौर में छुआ है और मुझे याद है चाय की दुकानों पर होने वाली बहस की यार सचिन चला जायेगा तो इंडिया की टीम का क्या होगा ?
२४ साल तक लोगो की भावनाओ को अपने कंधे पर ढोने वाले कंधे कितने मजबूत होगे। सोचने वाली बात है।

वैसे ये आज पूरे भारत की नहीं बल्कि दुनिया में फैले करोड़ो प्रशंसको के लिए दुखद समय है और मैं बड़े दम और पुरजोर से अपनी ये बात रखना चाह रहा हूँ कि आपके क्रिकेट से अलविदा कहने का सबसे बड़ा कारण मीडिया है जिन्होंने पिछले काफी कुछ समय से आप पर दवाव बनाया हुआ था।
क्रिकेट भी वही रहेगा रोमांच भी वही रहेगा पर आपके बिना सब फीका रहेगा। 


आपका प्रशंशक —