आधुनिक काल में लोकतांत्रिक आदर्शों के क्रियावन्यन के लिए जिस विकेन्द्रीकरण की बात की जाती है उससे भारतीय जनमानस कभी भी अनभिज्ञ नहीं रहा है, कम से कम व्यवहारिक स्तर पर तो इसे निश्चितता पूर्वक कहा जा सकता है। हाँ,सैधांतिक स्तर पर हिन्द न तो लोकतन्त्र के बारे में और न ही विकेन्द्रीकरण के सबसे निचले पायदान पर स्थित इकाई पंचायत के बारे में भिज्ञ था।
इसके बारे में सैद्धांतिक रूप से जानकारी अंग्रेजों के शासन के बाद हुई। इन्होंने ही सर्वप्रथम भारतीयों को लोकतन्त्र के सिद्धांत का क ख ग घ पढ़ाया। ये अलग बात थी कि हमारे यहाँ कोई निर्णय लेने से पहले आम राय बनाने की प्रथा प्राचीन काल से ही प्रचलित थी।ऋगवेद में उल्लेखित सभा और समिति इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यहीं समिति जिसे आम सभा कहा जाता था, राजा का चुनाव करती थीं। ये समितियां और सभाएँ इतनी शक्तिशाली हुआ करती थी कि राजा को भी इनकी सहमति के लिए इनका मुँह निहारना पड़ता था। इस तरह के प्रचलित स्वशासन पद्धति का सर्वाध्कि व्यवस्थित रूप चोल साम्राज्य में देखने को मिलता है। इनके साम्राज्य में स्थानीय स्तर पर सक्रिय अधिकारी सभी प्रकार के ऊपरी दबाव से मुक्त हुआ करता था। उसके कार्य में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप का न होना यह प्रदर्शित करता है कि स्वतन्त्रता के मूल्य की कितनी गहरी समझ देश के तत्कालीन शासकों को थी। इस पद्धति का वैधानिक अवतरण भारत में 19वीं शताब्दीं में उस सयम हुआ जब अंग्रेजी हूकूमत राजस्व प्राप्त करने के नये तरीके ढूढ़ रही थी। इस छानबीन की पद्धति में उसे स्थानीय शासन की स्थापना का ख्याल आया और आधुनिक भारत के इतिहास में वैधनिक रूप से 1882 में रिपन ने स्थानीय शासन पद्धति की स्थापना की। हॉलाकि यह शुरूआत भारत में इस प्रकार की पद्धति को सुदृढ़ करने के लिए नहीं की गयी थी, बल्कि इसके जरिए राजस्व के सृजन के नये स्रोत स्थापित करना था। इसी प्राथमिक ध्येय की वजह से इस दिशा में कोई वास्तविक प्रगति नहीं हुई। हाँ, स्वतन्त्राता के उपरान्त गाँधीवादी विचार को अंगीकृत करते हुए संविधन के भाग 4 राज्य के नीति निदेशक तत्व में इसे शामिल किया। बावजूद इसके पंचायत राज संस्थाओं की स्थापना में सही प्रगति 1990 के दशक में हुए। हाँलाकि इसके पहले गांध्ी के प्रिय शिष्य और भारत के प्रथम प्रध्नमंत्राी जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले से इसकी शुरूआत कर दी थी। मगर वह 1990 के दशक में हुई शुरूआत की तरह जनसंख्या के अनुसार आरक्षण देने का प्रावधन किया गया। कुछ इसी तरह की छूट अन्य पिछड़ा वर्ग के संदर्भ में राज्यों को दी गयी है। हाँ, महिलाओं के लिए 1/3 सीटें आरक्षित की गयी थी जिन्हें बढ़ाकर अब 50% कर दिया है। इन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए 29 विषय आवंटित किये गये हैं। सरकार द्वारा उठाये गये इस कदम में संघीय शासन व्यवस्था की परिभाषा को ही बदल दिया। सामान्यतः संघ वह होता है जिसमें केन्द्र और राज्य स्तर पर दो सरकारें बिना एक-दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप किये हुए अपना-अपना कार्य संचालित करती है। इस परिभाषा में संशोध्न भारत के 73वें संविधन संशोधन ने कर दिया। अब के भारत की दृष्टि में संघ उसे कहेंगे जहाँ पर द्वस्तीय सरकार के बजाय त्रिस्तरीय सरकार हो। सरकार के इस प्रयोग ने निश्चित रूप से शासन का विकेन्द्रीकरण किया है और आम लोगों को अपने नीति निर्धरण में प्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का मौका दिया है। इसने हाशिए पर खड़े उन लोगों को नीति निर्धरण करने का मौका दिया जिन्हें समाज इसके लिए असक्षम मानता था। इसके बाद भी इस स्थानीय शासन प्रणाली से जो आशा की गयी थी उसे पूरा करने में यह पूर्ण रूप से सपफल नहीं रही है। इस आंशिक सपफलता की वजह इसमें वर्तमान कई समस्याएं रही है। पहला, ग्राम सभा की सबसे बड़ी समस्या है कि इसकी नियमित बैठकें नहीं होती हैं। ग्राम सभा काम तो तभी करेगी जब इसकी नियमित रूप से बैठकें हों। यदि ग्राम सभा की बैठक होती है तो ग्रामीण जनों की भागीदारी बहुत कम होती है। ग्राम सभा की बैठक की सूचना भी सभी गांववासियों तक नहीं पहुँचती जोकि शोचनीय है। ग्राम पंचायतों में गुटबाजी की वजह से पदासीन सरपंच या उसके पक्ष के लोग ही ग्राम सभा में आते हं। ग्राम सभाओं में महिलाओं की उपस्थिति अभी भी बहुत ही कम है। स्थिति यह है कि ग्राम सभा की बैठकों में कोरम तक पूरा नहीं हो पाता है। दूसरा, पंचायती राज व्यवस्था में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, निष्क्रियता आदि कारणों से सरपंच या पंचायत सदस्य ग्राम सभा की बैठक नहीं बुलाते हैं जिसमें ग्रामीणों को पूरी तरह से अनभिज्ञ रखा जा सके। तीसरी ग्राम सभा की बैठकों में ग्रामीणों में दिलचस्पी का भी अभाव है। महिलाओं की कम सहभागिता, पुरुषों की खेत-खलिहानों में व्यस्तता, ग्रामीण विकास के प्रति जागरुकता की कमी इत्यादि कारणों से भी ग्राम सभा में उपस्थिति बहुत कम रहती है। चौथा, ग्राम सभा के काम-काज के बारे में गांवों के लोगों को जानकारी नहीं है। ग्राम सभा के क्या कार्य व अध्किार हैं, ग्राम पंचायत ग्राम सभा के साथ मिलकर कैसे कार्य करेगी, ग्राम सभा की बैठक में किस तरह के प्रस्ताव रखे जाएं, ग्राम सभा के सदस्य में रूप में हमारे क्या अधिकार हैं आदि की जानकारी का ग्राम सभा के सदस्यों में अभाव है। पांचवा, ग्राम सभा का क्षेत्रा बहुत-सी ग्राम पंचायतों में बहुत बड़ा होता है। कई ग्राम पंचायतों में छोटे-छोटे गांव, ढाणी शामिल हैं जोकि 5-6 किमी की दूरी पर भी स्थित हैं। इतनी दूरी तय कर लोग ग्राम सभा की बैठकों में नहीं जा पाते विशेषकर स्त्रियाँ व दिहाड़ी मजदूर वर्ग के लोगों के सामने यह बड़ी समस्या है। बड़ी पंचायतों व गांवों में ज्यादा दूरी ने भी निर्णय प्रक्रिया में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने में बाधा खड़ी की है। छठवा, ग्राम सभा की इच्छा व परामर्श से ग्राम पंचायतों को कार्य करना है न कि पंचायतों को अपनी मन मर्जी से कार्य करना है। ग्राम सभा द्वारा स्वीकृति मिलने पर ही पंचायती राज संस्थाओं को योजनाओं व कार्यक्रमों को लागू करना चाहिए। लेकिन पंचायती राज संस्थाएं ग्राम सभा को नशरअंदाज करके ही कार्य करती है। इस तरह ग्राम सभा का पंचायतों के कामकाज पर कारगर नियंत्राण नहीं है। सातवा, आज पंचायती राज व्यवस्था का पूरी तरह से राजनीतिकरण हो गया है। पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य सभी राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए हैं। पंचायत चुनावों में ध्न, बल, बाहुबल का प्रयोग होता है। ग्राम सभा में भी स्थानीय राजनीति व गुटबाजी का प्रभाव दिखता है जिससे इसमें उपस्थिति धीरे- धीरे कम होती जा रही है इससे स्थिति और बिगड़ गई है। आठवा, ग्राम सभा केवल चर्चा करने का मंच बनकर रह गई है। ग्राम सभाओं में जानबूझकर ग्राम पंचायत द्वारा भ्रमित करने वाली चर्चाएं कराई जाती हैं। ग्रामीणों का ध्यान जान-बूझकर बेवजह की चर्चाओं, वाद-विवाद से भटकाया जाता है। ग्राम सभाओं कीचर्चाओं में संभ्रांत लोगों की ज्यादा भूमिका होती है। इस तरह से ग्राम सभा की बैठकों को जान-बूझकर निष्प्रभावी बनाया जाता है। नौवा, विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी और उपलब्ध् साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि यदि महिला सरपंच है या अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य सरपंच है तो उसकी अध्यक्षता में ग्राम सभा की बैठक में हिस्सा लेना बहुत से लोग अपनी शान के खिलापफ समझते हैं। इत तरह की विकृतियों ने भी ग्राम सभा की बैठकों में कम उपस्थिति को बढ़ावा दिया जाता है। इन कारणों की वजह से समाज के विभिन्न वर्गों को पंचायती राज व्यवस्था में मिलने वाले प्रतिनिध्त्वि को चुनौती दी है। दसवा,ं कुछ ग्राम सभा की बैठकें मात्रा रस्मी रह गई हैं। ग्राम पंचायत से जुड़े लोग रजिस्टर घर-घर घुमा कर लोगों के हस्ताक्षर ले लेते हैं और सभा में गए बिना ही उनकी उपस्थिति बन जाती है। पंचायतें कागशी तौर पर काम करने लगी हैं। इस तरह की घटनाओं ने पंचायती राज व्यवस्था से लोगों का विश्वास तोड़ा है। ग्यारहवा ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था का अभिन्न अंग है। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद द्वारा विकास कार्यों में निभाई गई भूमिका का पूरी पंचायती राज व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। जिस तरह से संभ्रांत लोगों का इस व्यवस्था में दबदबा है उससे पूरी पंचायती राज व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। बारहवा ग्राम सभा की कार्यवाही पर नौकरशाही व राज्य प्रशासन को विश्वास नहीं है। ग्राम सचिव और अन्य ग्रामीण विकास अधिकारी अभी भी ग्राम सभा की कार्यवाही और प्रस्तावों में किसी भी तरह का विश्वास नहीं करते हैं। यह धरणा है कि ग्राम सभा के प्रस्ताव उचित नहीं हो सकते और ग्रामीणों की सोच-समझ ग्रामीण विकास के प्रति विश्वसनीय नहीं हो सकती है। यह निर्णय प्रक्रिया में उचित सहभागिता नहीं निभा सकते है। तेरहवा कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि पंचायती राज संस्थाओं के लोग ग्राम सभा के सशक्तीकरण की बातें तो शरूर करते हैं लेकिन वे ये नहीं चाहते हैं कि ग्रामीण जन जागरूक हों सत्तासीन लोगों को भय है कि ग्राम सभी की सक्रियता से उनका महत्व घट जाएगा। ग्राम सभा को एक समस्या के रूप में भी लोग देखते हैं। इस तरह पंचायती राज व्यवस्था के लोग भी ग्राम सभा को सुमुप्त और कमजोर रखना चाहते हैं। चौदहवा, पंचायती राज के विशेषज्ञ प्रोपेफसर एम. असलम के अनुसार, राज्यों के पंचायत कानूनों में ग्राम सभा की भूमिका और जिम्मेदारियो का अगर ज्यादातर मामलों में ग्राम सभा की भूमिका सलाह देने वाली संस्था की ही है। इसी तरह, ज्यादातर राज्यों के कानूनों में कहा गया है कि ग्राम सभा सलाह देने वाली संस्था है और पैफसले लेने के अधिकार ग्राम पंचायत के पास हैं। इस तरह राज्यों के कानून में सबसे बड़ी कमी पंचायतों और ग्राम सभाओं केअधिकारों और कार्यक्षेत्रा के निर्धरण के मामलों में है अन्ततः यह कहना गलत नहीं होगा कि ग्राम सभा के सशक्तीकरण में सरकारी प्रयास सराहनीय नहीं रहे हैं। पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों को समय-सयम पर प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन ग्राम सभा सदस्यों को किसी भी तरह का प्रशिक्षण प्रदान नहीं किया जाता है जिससे ग्राम सभा के कार्य, उत्तरदायित्व व निर्णय प्रक्रिया से ग्राम सभा के सदस्य हमेशा अनभिज्ञ रहते हैं। अब यदि इनके उचित निष्पादन को व्यवहारिक ध्रातल पर साकार करने की प्रतिबद्धता रखते है तो कई ऐसे काम उठाने होंगे जिनसे इन्हें और सशक्त बनाया जा सके। इसके लिए सबसे पहले ग्राम सभा के कार्य, अधिकार व उत्तरदायित्वों की ग्रामीणों को पुख़्ता जानकारी व शिक्षा दी जाए। इसके लिए जन-जागृति कार्यक्रम चलाना चाहिए। इसके लिए ग्रामीण क्षेत्रा में ग्राम सभा संबंद्धि जनसभा, संगोष्ठी, प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक, आकाशवाणी कार्यक्रम, दूरदर्शन कार्यक्रम इत्यादि आयोजित करने चाहिए। दूसरा प्रौढ़ शिक्षा केंद्रों व कार्यक्रमों में ग्राम सभा के कार्य वअधिकारों की जानकारी दी जानी चाहिए। ग्राम सभा के सदस्यों को छोटे-छोटे प्रशिक्षण मॉड्यूल पर आधरित शिक्षा दी जा सकती है। तीसरा पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों जैसे- सरपंच, पंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्यों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों व पंचायती राज पदाधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विशेषकर ग्राम सभा के महत्व व इसकी सक्रियता पर विशेष रूप से प्रशिक्षण देना चाहिए। ग्राम पंचायत के सदस्यों को विशेषकर ग्राम सभा का महत्व बताना चाहिए ताकि ग्राम सभा नियमित रूप से ग्रामीण विकास में अपना योगदान कर सके। चौथा ग्राम सभा की यदि नियमित रूप से आवश्यक व निश्चित बैठक नहीं होगी तो इसका अर्थ ही समाप्त हो जाएगा। यदि कोई सरपंच या अन्य सदस्य किसी भी कारण से ग्राम सभा की बैठक नहीं करवाता है तो संबंध्ति सरकारी अपफसरों व ग्राम पंचायतों पर सख़्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि कानूनी डर से लोग इसकी नियमित बैठक कराएं। इस तरह ग्राम सभा की भूमिका तथा दायित्व और ग्राम पंचायत के कार्यों के साथ उसके संबंध् का भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए जिससे हर स्तर पर स्पष्टता निश्चित हो। पाँचवां ग्राम पंचायतों का स्वरूप व क्षेत्रा भी बड़ा नहीं होना चाहिए। 7-8 गांव या ढाणियों को एक ग्राम सभा नहीं होनी चाहिए। गांवों की दूरियों के कारण दिहाड़ी मशदूर, बुजुर्ग तथा महिलाओं के लिए बैठकों में हिस्सा लेना कठिन होता है। इसलिए हर गांव की अपनी ग्राम सभा होनी चाहिए। छठवां महिला व दलित वर्ग के प्रतिनिधियों के नेतृत्व में भी ग्राम सभा की बैठकों को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि इस वर्ग के नेतृत्व को वास्तव में ग्रामीण समाज स्वीकार कर सके। इस तरह के प्रयासों से भी ग्राम सभा में उपस्थिति व इसकी प्रक्रिया में सक्रियता बढ़ेगी। सातवां गा्रम सभा के सशक्तीकरण में ग्राम सचिव, पंचायत पदाधिकारियों व नौकरशाही की भूमिका महत्वपूर्ण है। नौकरशाही व राज्य प्रशासन को ग्राम सभा में विश्वास व्यक्त करना चाहिए। ग्रामीणों की निर्णय प्रक्रिया व विकास की प्राथमिकताओं का नौकरशाही द्वारा सम्मान किया जाना शरूरी है। आठवां ग्राम सभा को केवल सलाह-मशविरा वाली संस्था नहीं समझना चाहिए। गांव के स्तर पर सभी विकास योजनाओं व आगामी वित्तीय वर्ष के बजट की मंजूरी देने का अधिकार ग्राम सभा के पास कागजी तौर पर न होकर वास्तव में होना चाहिए। ग्राम सभा की बैठकों की कार्यवाहियों का रिकार्ड रखना चाहिए। समय-समय पर उसकी जांच ग्राम पंचायत के कार्यों के साथ करनी चाहिए। ग्राम सभा के निर्णय वास्तविक रूप से गा्रम पंचायत द्वारा मान्य होने चाहिए। राज्य सरकारें अपने कानूनों द्वारा ग्राम सभा को अधिकार देकर इसको सशक्त बनाए जिससे इसकी उपयोगिता सार्थक हो सके। आठवां ग्राम पंचायत, पंचायत समिति व जिला परिषद के कार्य व अधिकारों के बारे में भी ग्रामीणों को जानकारी होना शरूरी है। इससे पंचायती राज संस्थाएं क्या कर सकतीं हैं इसका पता चल सके। का पता चल सके। इससे ग्राम सभा में सामाजिक अंकेक्षण भी स्पष्ट तौर पर होगा। ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की विभिन्न माध्यमों द्वारा ग्राम सभा सदस्यों को जानकारी देनी चाहिए। ग्रामीण अंचलों में केंद्रीय व राज्य सरकारों के कौन से कार्यक्रम चल रहे हैं इन सभी का प्रचार व प्रसार ग्राम सभा सदस्यों तक पहुँचना चाहिए जिससे वे ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकें। नौवा ग्राम सभा की सक्रियता व सपफलता पूरी तरह से ग्राम पंचायत पर निर्भर करती है। इसलिए पंचायत राज पदाधिकारियों द्वारा ग्राम पंचायत को वैधनिक तौर पर ग्राम सभा की विभिन्न प्रक्रियाओं में शामिल करने का प्रयास करते रहना चाहिए। ग्रामीण विकास की चालू योजनाओं व आगामी योजनाओं सम्बन्धी विभिन्न प्रकार के निर्णय ग्राम सभा द्वारा आवश्यक तौर पर किए जाने चाहिए जिसका ग्राम सचिव लिखित रूप में रिकार्ड रखे। दसवाँ ग्राम सभा को व्यापक दृष्टिकोण से देखने का शरूरत है। ग्रामीण जीवन की समस्याओं को भी ग्राम सभा के विचार क्षेत्रा में लाया जाना चाहिए जिससे समस्याओं के समाधन में गांव के लोग सहयोग कर सकें। नशबंदी, दहेज प्रथा, सपफाई, स्वास्थ्य, अकाल, भूकंप, शिक्षा, अनुसूचित जाति व जनजाति और पिछड़े वर्गों के विकास और कल्याण संबंध्ी विषयों पर भी ग्राम सभा में विचार-विमर्श किया जा सकता है।
अंत में हम कह सकते हैं कि ग्राम सभाओं की सक्रियता से ग्राम पंचायत ग्रामीण विकास का कार्य ईमानदारी और निष्ठा से कर सकती है। ग्राम सभा ही ग्राम पंचायतों पर नियंत्राण कर सकती हैं। ग्रामवासियों को ग्राम सभा का महत्व, कार्य औरअधिकारों को समझना होगा क्योंकि यही एक ऐसा मंच है जहां पर सामाजिक अंकेक्षण हो सकता है। इसलिए ग्राम सभा का जीवंत रूप में कार्य करना अनिवार्य हो जाता है। ग्राम सभा केवल खानापूर्मि की ही जगह न बन जाए बल्कि यह लोगों को ग्रामीण विकास के प्रति जागरूक करे। ग्राम सभाओं को कारगर बनाकर ही ग्राम स्वराज का सपना साकार हो सकता है।
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