Monday, February 17, 2014

जाति आधारित जनगणना और आर्थिक आधार पर आरक्षण सामाजिक हित में या नहीं ?


जाति आधारित जनगणना  और आर्थिक आधार पर आरक्षण आज बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे है और बहुत ही चर्चा में है और कुछ लोग इसके पक्ष और विपक्ष, नुकसान और फायदे के बारे में बोल रहे है। लेकिन मेरा ये मानना है कि तस्वीर एक बार साफ़ हो ही जानी चाहिए क्यूंकि ये राजनैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी बेहद ज़रूरी है।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले अंग्रेज़ो ने जाति आधारित जनगणना  करायी थी उसके बाद काफी लम्बे समय के बाद भारत सरकार ने जाति आधारित जनगणना  कराने कि कोशिश की तो विभिन्न राजनैतिक दलो ने इसका विरोध किया और इसके विपक्ष में अनेको तर्क प्रस्तुत किये और सरकार जो जाति आधारित जनगणना  करा रही थी उसने इसका समर्थन किया और कुछ तर्क प्रस्तुत करे। जब जाति आधारित जनगणना  शुरू हुई तो लोगो ने कहा इससे जातिवाद में बढ़ोत्तरी होगी। एक तरफ हम जहाँ हम जाति को ख़त्म करने की बात कर रहे है और आधुनिकीकरण कि प्रक्रिया के तहत इनको ख़त्म कर रहे है और दूसरी तरफ ऐसी जनगणना  को शुरू करके जाति पहचान को हवा दे रहे है इससे कही ना कही आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बाधित हो रही है। जाति आधारित जनगणना  होने से विभिन्न जातियो के बीच विद्वेष बढ़ेगा इसलिए इस तरह कि जनगणना  नहीं करानी चाहिए। जिस चीज़ को हमने आज़ादी के बाद छोड़ दिया और आधुनिकीकरण कि ओर बढ़ रहे है फिर से हमे जाति आधारित पहचान को स्थापित करने का कोई औचित्य नहीं बनता। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य पिछड़े लोगो कि पहचान करके उनके लिए चलाये जा रहे विभिन्न विकास के कार्यक्रमो को बढ़ावा देना था और यदि इस प्रकार कि जनगणना  होती है तो ऐसे लोगो के लिए चलाये जा रहे विकास कार्यक्रमो का सही किर्यान्वयन किया जा सकता है। इसके अलावा  अनेक तर्कों में एक तर्क यह भी था कि हमारे पास सभी जातियो कि आर्थिक सामाजिक और शैक्षिणिक स्थितियों की सूचना होगी। इन सब स्थितियों को जानने के बाद उनके लिए विकास कार्यक्रमो का संचालन सही तरीके से हुआ या नहीं और यह  पता चलेगा कि जिनके लिए हम विकास कार्यक्रम चला रहे है उनका लाभ उन तक पंहुचा कि नहीं तब तक इसका तर्कसंगत मूल्यांकन सम्भव नही है। सबसे बड़ा पक्ष ये है कि आज आरक्षण को तर्कसंगत करने कि ज़रुरत है और इस प्रक्रिया से इसे तर्कसंगत किया जा सकता है।
हमको यह भी पता है कि स्वतंत्रता के पश्चात किन परिस्थितियो और किन उद्देश्यों में आरक्षण व्यवस्था लागू कि गयी थी। इसका उद्देश्य समान अवसर पैदा करना था और सबको इसका लाभ मिल सके क्यूंकि समाज में  संरचनागत असमानता विद्यमान थी इसलिए पिछड़े लोगो को संरक्षण देकर ऊपर उठाने का प्रयास किया गया ताकि वो भी सामान अवसर का लाभ ले सके। ये प्रावधान शुरुआत में १० वर्षो के लिए किया गया था और तब ये माना गया कि इन लोगो को उठाकर जब ऊपर ले आयेगे तो फिर इसकी ज़रुरत नहीं पड़ेगी लेकिन फिर इसके साथ कही कही राजनैतिक पक्ष भी जुड़ गया और यह भारत में आज तक बना हुआ है।
इसको तर्कसंगत तो दूर करने कि बात जो जातियाँ प्रभावशाली है और दवाब समूह के रूप में अधिक मज़बूत है सरकार के ऊपर दवाब बनाकर अपनी जाति के लिए आरक्षण कि मांग कर रही है। जिनको पहले से मिल रहा है और जिनको अब ख़त्म हो जाना चाहिए था उनको भी ख़त्म करने कि सरकार में हिम्मत नहीं है और कही कही आरक्षण कुछ मुद्दो पर विकास को बाधित कर रहा है क्यूंकि हमारा विकास का लक्ष्य सामाजिक न्याय से पूर्ण विकास है। जहाँ विकास के कार्यक्रम पिछड़े लोगो तक पहुचाया जा सके और उन तक विकास का लाभ पहुचाने के लिए हमने आरक्षण का प्रावधान किया था लेकिन इस व्यवस्था ने उस लाभ को ऊपर के लोगो तक ही सीमित रखा और पिछड़ो तक इसका लाभ ना पहुचे तो इसका कोई औचित्य नहीं बचेगा और ये हमेशा क्रीमी लेयर या ऊपर के लोगो तक लाभ पहुँचाता रहेगा और हर जाति के लोगो तक इसका लाभ नहीं पहुचेगा। विकास जो हमारा लक्ष्य है ये तभी सफल होगा जब हम इसका लाभ नीचे के लोगो तक पहुचाये इसलिए हमने एस सी केटेगरी को इज़ाद किया। और  पिछड़े लोगो के लिए हमने एस टी को पृथक रखा ताकि अन्य धर्म के पिछड़े लोगो को इसमें शामिल किया जाये।  एस सी को हमने धर्म से सम्बंधित रखा।  हमे लगा और लोग बच गये है उनको भी इस व्यवस्था का लाभ मिलना चाहिए इसके लिए हमने एक और केटेगरी ओबीसी बना दी।  पंजाब सिंह देशमुख ने सर्वप्रथम इसकी मांग की और अम्बेडकर जी की आल इंडिया शिड्यूल कास्ट फेडरेशन कि तरह आल इंडिया अदर बैकवर्ड क्लास फेडरेशन की स्थापना कर दी। देशमुख जी का कहना था कि कुछ लोग बच गये है इनको सरंक्षणात्मक भेदभाव के तहत लाभ मिलना चाहिए तभी सामान अवसर का लाभ सबको मिलेगा और तभी समता मूलक समाज कि स्थापना होगी।
यहाँ तक तो सब ठीक था क्यूंकि उद्देश्य अच्छा था। आरक्षण के तहत उन्होंने लाभ लिया इससे उनका विकास भी हुआ पर धीरे धीरे इन केटेगरी में विषमता की खाई बढ़ती गयी अर्थात इन केटेगरी में जो लोग आरक्षण का लाभ ले रहे थे वो तो ऊपर निकल गए कुछ लोग इस व्यवस्था का लाभ नहीं ले पाये तब जाकर ओबीसी में क्रीमी लेयर का प्रावधान लाया गया और कहा गया जो लोग ऊपर निकल गये है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जायेगा और जो रह गये है वो इस व्यवस्था का लाभ उठाते रहेगे। लेकिन अब एस सी और एस टी में भी क्रीमी लेयर की पहचान होनी चाहिए और कही कही स्थिति आज चुकी है कि क्रीमी लेयर को खुद से बाहर आ जाना चाहिए नहीं तो दिए गये आरक्षण का लाभ सामाजिक दृष्टि से सहजातिया या कोई एक जनजातीय निरंतर लेती रहेगी और नीचे के लोगो तक इसका लाभ नहीं पहुचेगा।
अब प्रश्न उठता है सरकार करे तो कैसे करे यदि सरकार इस तरह के कोई निर्णय लेती है तो पिछड़ी जातियो का जो नेतृत्व है वो उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा क्यूंकि वो मानने को तैयार नहीं है कि आजादी के इतने दिन बाद भी उनका विकास नहीं हुआ है। दूसरी तरफ एक समस्या और आ रही है कि वे जाति समूह जो मजबूत दवाब समूह के रूप में कार्य कर रहे है वो सरकार के ऊपर अनावश्यक दवाब बनाकर आरक्षण का लाभ लेने के पक्ष में है।  इसका परिणाम राजस्थान में गुर्जरो द्वारा आंदोलन के जरिये और जाट समुदाय द्वारा बिना आंदोलन के ही आरक्षण का लाभ प्राप्त कर लेना है।यहा उद्देश्य यह है कि किसी समुदाय को आरक्षण मिले लेकिन वो तर्कसंगत हो और वो तर्कसंगत तभी हो सकता है जब हमारे पास पूरे देश के हर जाति का सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक ब्यौरा होगा, उनकी असली तस्वीर सामने होगी और ये तस्वीर जाति आधारित जनगणना  से प्राप्त होगी। इससे दो तरह का फायदा होगा।  यदि लगता है और तस्वीर बताती है कि एस सी और एस टी में एक वर्ग इतना ऊपर आ चुका है कि उन्हें आरक्षण कि ज़रुरत नहीं है तो सरकार इन तथ्यो के आधार पर उन वर्गों को क्रीमी लेयर के दायरे में ला सकती है और सरकार के पास एक आधार होगा और सरकार ऐसा करती है तो किसी राजनैतिक दल या जाति समूह सरकार का विरोध इस रूप में नहीं कर पायेगा क्यूंकि उनका नैतिक स्तर विद्यमान नहीं होगा क्यूंकि सारी तस्वीर सामने होगी और जब सरकार आकड़े सामने रखकर निर्णय लेगी तो आप अतार्किक रूप से इसकी मांग नहीं कर सकते और दूसरी बात ये होगी कि वे जातिया जो अपने को पिछड़ा बताकर आरक्षण का लाभ ले रही है यदि तस्वीर सामने आ जाये तो वो भी आरक्षण मांगने कि स्थिति में नहीं रहेगी बल्कि मागेगी ही नहीं उनको मांगना ख़राब लगेगा। यदि राजस्थान में आज जाति आधारित जनगणना  यह स्पष्ट करती है कि गुर्जर राजस्थान में सबसे विकसित समुदायो में से एक है यदि ये तस्वीर सामने आ जाती है तो क्या लगता है गुर्जर समुदाय को आरक्षण मागने की हिम्मत होगी ?
क्या अन्य जातीय समूह जो दवाब समूह के रूप में ज्यादा संगठित नहीं है जिनकी संख्या कम है जो सरकार पर दवाब बनाकर सरकार के निर्णयो को अपने समूह के हितो के पक्ष में प्रभावी करवा पाने में सक्षम नहीं है लेकिन उनकी सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति कमज़ोर है उनको  आरक्षण कि ज़रुरत है लेकिन किसी कारण उनको आरक्षण नहीं मिल पाया। जाति आधारित जनगणना  जब यह तस्वीर स्पष्ट कर देगी तो आरक्षण का लाभ उन तक भी पंहुचा पायेगे।
एक नयी चर्चा उठा रही है आर्थिक आधार पर आरक्षण।  जाति आधारित जनगणना  से हमारे सामने एक मार्ग और प्रशस्त हो जायेगा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए कि नहीं ? शुरुआत से भारत में आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन रहा है। अब प्रश्न था  कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े कौन ? अंग्रेज़ो के समय भी काफी वाद विवाद हुआ। अम्बेडकर जी लड़ते रहे क्यूंकि उसके पहले अंग्रेज़ो ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए भारतीय समाज में विभाजन उत्पन्न करने के लिए जाति आधारित आरक्षण दे चुके थे। सामाजिक और  शैक्षणिक से पिछड़े को आधार उन्होंने जाति को बनाया था इसलिए आजाद भारत को इसे स्वीकार करना पड़ा। इसको स्वीकार करने के लिए कुछ तर्क भी थे। ऐतिहासिक रूप से भारतीय समाज जाति प्रधान समाज रहा है  जहा निम्न जातिया सामाजिक क्षेत्रो में पिछड़ी रही तो उनके सामाजिक और शैक्षणिक आधार को पहचानने से अच्छा था कि क्यूँ ना जातियो को आधार बना दिया जाये और इस पिछड़ेपन का कारण उन्होंने जाति को बना दिया।  इस प्रक्रिया में ऊँची जाति आरक्षण का लाभ लेने से वंचित रह गयी या वे जातिया जो तथाकथित तौर पर ऊँची जातियो में गिनी जाती थी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी नहीं मानी गयी उनको इस सूची में शामिल नहीं किया गया और उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिला। उस समय के हिसाब से ये निर्णय को सही कह सकते है लेकिन आजनविन आर्थिक सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था और सरकार द्वारा किये गए प्रावधानो का लाभ उठाकर परंपरागत सामाजिक सोपान में जो नीचे के लोग है वो आज काफी ऊपर आ गए है और कई ऊपर के लोग पिछड़ भी गए है। जिससे नवीन भारतीय समाज में नए तरीके कि असमानता भी प्रकट हुई है जो नए आर्थिक विकास के मॉडल का परिणाम है और इस नए समाज कि व्यवस्था का परिणाम है।
और जब आरक्षण का उद्देश्य नीचे के लोगो को मदद करके ऊपर उठाना है जिससे वो समान अवसर का लाभ उठा सके तो जो आज पिछड़े लोग वो चाहे ऊँची जाति के हो या नीची जाति का उसे वह सुविधा मिलनी चाहिए। लेकिन सरकार ऐसा करती है तो तो कई राजनैतिक दल इसका विरोध कर सकते है जाति आधार पर भारत में विभाजन कि प्रक्रिया गतिशील हो सकती है जातिवाद बढ़ सकता है समाज विखंडन कि ओर बढ़ सकता है तो  सरकार चाह कर भी इस तरह का निर्णय नहीं ले सकती है।  बातें उठती है तो एक साथ कई विरोध के स्वर भी उठने लगते है। लेकिन जाति आधारित जनगणना  हो जाने पर हमारे सरकार के सामने एक तस्वीर बिलकुल साफ़ होगी कि  नीचे में भी कुछ ऊँची जातिया है।  जब यह तस्वीर सामने आ जायेगी तो हमारी सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण पर एक कठोर निर्णय ले सकती है और फिर किसी भी राजनैतिक दल या जाति समूह को इसका विरोध करने का नैतिक आधार नहीं मिल पायेगा।

6 comments:

  1. विषय बहुत उम्दा है, विश्लेषण अच्छा किया है लेख बेहद तथ्यात्मक है जनाब, आपके विचारों और उठाये गए मुद्दों से पूरी तरह से सहमत हूँ !

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  2. Bahut khoooob..!!!
    Isi tarah apne nazariye ko lafzo me byaan krte ho..��

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  3. hamara lekhak kaisa ho, abhay pandey jaisa ho.

    wakup

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  4. Barso se jati ke naam pr logo ka sosan hota raha hai...to reservation bhi jati aadharit honi chahiye....aarthik rup se pichare aarkhan ko koi auchitye nahi hai

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  5. Still you don't know that why we have reservation system in India. Reservation was introduced for the people who are out of society. Still we don't have 'Samanta Ka Adhikaar'. People still follow King Manu's rules.

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